सोमवार, 4 अक्टूबर 2010

पांडे जी के बाराती

१९९४ में मध्य प्रदेश के दमोह में रहकर काम करते हुए मुझे दो साल हो चुके थे, और नई जगह अब पुरानी और अपनी लगती थी। बुन्देलखंडी बोली सीख चुके हम इसे बड़े मज़े ले लेकर बोलते थे। जरुरत पड़ने देर रात तक काम निपटाना, किसी नए काम के लिए खुद ही आगे आना, और कुछ छोटे मोटे अच्छे काम करने के बाद मेरी तत्कालीन कम्पनी के बॉस ने मुझे प्रोमोट करके शाखा प्रभारी बना दिया था। हम सभी स्टाफ अलग अलग जगहों के रहने वाले थे लेकिन दमोह में एक ही बड़े घर को किराये पर लेकर साथ रहा करते थे, इससे आपस में सामंजस्य बना रहता था और काम पड़ने पर एक दुसरे के सुख दुःख में भी हम काम आ जाया करते थे।
मोटा सा लेकिन पेंसिल की नोक की तरह मुच्छ रखने वाला एक राजकुमार सिंह था जो बात बात पे अपने पैतृक गाव गोंडा में रहने वाली अपनी पत्नी की याद किया करता और हमें बोर किया करता। एक डॉक्टर संजय गौर भी थे , सीधे सहज से दिखने वाले डॉ गौर कम्पूटर हंडल किया करते थे, और वो हमें कभी नहीं समझा पाए की जब वे डॉ थे तब हमारे साथ वहा क्या कर रहे थे। छतरपुर के गोरे गोरे से भावुक दिखने वाले गोविन्द दुबे और नौगाँव के काले कलूटे पर दमदार नामदेव भी थे, एक और शख्स था जो था तो हमारा पीयून लेकिन जब भी थोड़ी सी पी लेता था तब खुद को सी इ ओ और बाकी सबको अपना पीयून समझता --- नाम था " जंगली प्रसाद यादव" काला इतना के अँधेरे में अपनी तरफ चलता हुआ आये तो सिर्फ दो सफ़ेद आँखें ही दिखाई देती थी, बाकी चेहरा रात के अँधेरे से मैच कर जाता था। हमारी रोज़ की तय दिनचर्या थी... रोज सुबह साथ में काम पर निकलते , दिन भर ऑफिस में काम में लगे रहते और देर रात को जब घर लौटते तब तक सभी दुकाने बंद हो जाया करती थी। फिर जो भी रूम में पडा होता वोही साथ मिलकर बना खा लेते या कही होटल में चले जाते। बिच बिच में भारी वर्क लोड से ताजगी के लिए छोटी पार्टी भी कर लेते और तनाव, थकान मिटा लेते।
एक दिन सुबह ऑफिस में एक दुबला पतला सा नौज़वान आया , सामने से काउंटर पर पूछ ताछ करने के बाद मेरी तरफ आया और परिचय दिया की उसका नाम " अनिल पाण्डेय " है , नया नया ज्वाइन हुआ और उसे मेरे पास मेरी ब्रांच में भेज दिया गया है। लखनऊ के पास पडरौना का रहने वाला अनिल एक बैग लिए था , हलकी मुच्छ्ह, रंग गोरा था, हम सभी ने एकमत से तय किया और उसे भी अपने साथ ही रहने को कह दिया...जोशीले और मेहनती से लगने वाले अनिल के साथ काम में मज़ा आने लगा था। उसने भी जल्दी ही सभी से अपने को जोड़ लिया था, खाने पीने में भी उसकी आदते बाकि सबसे बिलकुल मिलती थी। और मेरी अपेक्षाओ के अनुरूप भी मेरे जानने वाले पांडे, मिश्र, त्रिपाठी, चौरसिया, बाजपाई, शर्मा, दुबे जैसे श्रेष्ठ नाम वाले लोगो की ही तरह सब कुछ खा जाने वाला पंडित निकला था। ये सभी हाई क्लास के बेवडे और खूंखार नॉन वेजी थे।
एक दिन हमारी फिल्ड कार्यकर्ता सुनील चौरसिया जी ने अपने साथ एक लड़की को ऑफिस में लेकर आये, परिचय कराया की उसका नाम भावना है और उनकी नयी असिस्टंट है और ऑफिस में बैठकर उनकी टीम के पेंडिंग काम निप्तायेंगी।
उस दिन तो ऑफिस में गजब की सज्जनता दिखाई दी, हर कोई एक दुसरे को बड़ी शालीनता से पुकारता और काम में सबसे तत्पर दिखाई देने की कोशिश कर रहा था, और बार बार आँखे फाड़ फाड़ के भावना को ही घूर रहे थे, दर असल वो दिखने में कमाल की थी। इतनी गजब की बला को हम किसी ने कभी नहीं देखा था, घुन्गुराली जुल्फे....चक गोरे गालो पे पड़ते डिम्पल , दुबली पतली कमर, अच्छी ऊंचाई, और आवाज में रेखा जैसी कसक, कपडे पहनने और चलने के हुनर में अपने समय से १० साल आगे , ऑफिस में तो जींस , टी शर्ट, खुबसूरत लहंगे तक पहन कर चली आती , और बाहर तो शहर में हाफ निक्कर में ही निकल पड़ती, इस पर उसके बर्ताव का खुलास पण ऐसा, की जिस किसी से बात करे तो बन्दा गलतफहमी का शिकार हो जाए । जल्दी ही १८ साल की भावना ऑफिस का केंद्र बिंदु बन गई, हद तो यहाँ तक हो गई, की कमबख्त जे पि और आर के ( जंगली प्रसाद और राजकुमार ) दोनों भी दिन भर उसी के पास मंडराते और खुद को बार बार कुवारा कहते फिरते, सबसे कम उम्र होने का फायदा हमें नहीं मिल पाता क्योकि " शाखा प्रभारी " होने के नाते ब्रांच की पूरी कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी हम पे आन पड़ती , इसलिए कोई भी नियमो के बाहर न जा पाए इसका मुझे ही ध्यान रखना पड़ता। और में दुसरो से ज्यादा मच्योर दिखने का प्रयास करता रहता। अपने पागल बन चुके सहकर्मियों के लिए कार्यालय में लगे आदर्श विचारो के नोटिस बोर्ड पे एक बार लिख ही डाला " भावनाए हमें कमज़ोर बनाती है, कृपया अक्ल से काम लो " भावना ने अपना मॉडल की तरह एक शानदार खुबसूरत एल्बम बना रखा था, उसमे से फोटो निकाल के सबको अपना कातिलाना अंदाज़ बताती।
एक रविवार की सुबह हम देर तक सोने की तमन्ना लिए अध्निंद में पड़े थे, सभी लड़के अपने स्टाइल में लम्बे से लगे एक बिस्तर पे गर्मी के दिनों में सिर्फ कछ्चे पहन के सोये थे, किसी के डोर बेल बजाने पे आधी नींद में जे पि ने दरवाजा खोल दिया और जैसे ही सामने देखा तो चीखते हुए अन्दर की तरफ भागा , मैंने उठके देखा तो सामने भावना हाफ निकर और टी शर्ट पहने हाथ में वोली बाल लिए चली आई थी, अपनी अपनी चादर लिए सब शर्मिंदा से भाग खड़े हुए और फिर ठीक से कपडे पहनके लौटे । लेकिन वो बिना किसी अहसास के सबसे बात करती रही, धीरे धीरे वो हम सभी के साथ बहुत समय तक अकेले रहा करती । हम भी धीरे धीरे उस से ज्यादा मज़ाक और छेड़ना कम करने लगे थे, उसका सबसे बड़ा कारण जो हमें मालूम पडा था की शहर के कई खूंखार गुंडों को उसने अपना भाई और न जाने क्या क्या बना रखा था ? और खुद उसके सगे भाई की किसी ने गैंग वार में हत्या कर डाली थी ।
थोड़े ही दिने में हमने कुछ बदलाव देखे की अनिल पाण्डेय थोडा गंभीर सा लग रहा था और भावना भी ! कुछ दिनों में बात खुलने लगी की अनिल और भावना के बिच प्यार पनपने लगा है, भावना के बारे में जे पि और आर के बार बार मज़ाक करते और अनिल लड़ पड़ता, आर के अनिल से चिढ़कर कहता " बेटा अनिल, सोच ले , सुधर जा, न जाने कब कौन कहाँ से आएगा और तेरे गन लेकर तेरे खोपड़ी का निशाना ले लेगा, "
पर पाण्डेय जी तो लगता था की फँस गए थे, बचने की कोशिश तो की होगी पर जम नहीं सका होगा, जब अनिल कुछ ज्यादा ही गुस्सेल हो गया तो मैंने उससे पुछ लिया, उसने बताया की " बड़ी उलझन है शादी न करू तो दिल टूट जायेगा, और कर लू तो लखनऊ में घर वाले मार भगायेंगे, भावना शादी के लिए कह रही है, बात उसके खूंखार घरवाले तक भी पहुँच गई है, आप ही बताओ क्या करू ? " उस रात बहुत सोचता रहा किन्तु मुझे कुछ नहीं सुझा, लगा की पांडेजी ने अपने बचने के रास्ते बंद कर लिए थे , अगले दिन मैंने उससे पूछा की शादी करोगे ? अनिल रोते रोते बोला " हां" लेकिन शादी होगी कैसे, गाव से तो कोई नहीं आयेगा और यहाँ कोई नहीं है मेरा । मैंने जब देख लिया की लड़का लड़की दोनों तैयार है तो बस तय कर लिया की अब दोनों की शादी कराना ही है, सभी लडको की मीटिंग लेकर एलान कर दिया की अब पांडेजी की शादी करना है, हम सब मिलकर शादी की तैयारी में लग गए, इस के लिए सबने एकमत से मुझे अध्यक्ष चुन लिया, बाकायदा सबने मिलकर एक दिन भावना के घर डरते डरते पहुंचे, उसकी माँ और पापा से मिलकर लड़की का हाथ मांगा, ठीक वैसे ही जैसे फिल्मो में होता है, बड़े ही स्टाइल से भावना के खूंखार बूढ़े बाप को समझाया, उसने भी देखा की " मुफ्त में स्मार्ट सा दूल्हा बिना दहेज़ के घर में लड़की मांग रहा है थोडा नाटक करने के बाद हां बोल दिया, " दिन और समय तय हुआ, सभी तैयारियों की बाते भी हम सब ने मिलकर कर ली, उन दिनों हमने ऑफिस में काम कम और शादी की तैयारिया ज्यादा की, रात और दिन करके कमाए गए बोनस और ओवर टाइम के पैसे एक जगह इकट्ठे किये, महीने की पगार होने पे भी हमने एक बड़ी रकम चंदे से जमा की, कुछ पैसे अनिल जुगाड़ कर ही चूका था, अनिल और भावना के लिए कपडे लिए गए, जितना जमा गहने लिए, बैंड - बाजा भी तय किया, एक दोस्त से मारुती कार मांग के ले आये, दोनों के साथ रहने के लिए पास में ही एक कमरा देख लिए, दोनों के हनीमून के लिए खजुराहो में होटल भी बुक कर लिए, शादी में गिफ्ट के नाम पर सबने अपनी अपनी पसंद की चीज़े दान कर दी, मेरे पास एक ब्लैक & व्हाइट टी वि था जिसपर हम सब कार्यक्रम देखते थे, वाही अनिल के रूम में लगवा दिया,
और वो दिन भी आया जब अनिल की बरात हमने अपने मित्र उमाशंकर चौरसिया जी के घर से निकाली, बारात छोटी ज़रूर थी, पर सड़क पर सब कुछ जाम हो गया था, जे पि ने पूरा बंदोबस्त किया था की बरात में नाचते वक़्त किसी को थकावट न आये, जिसे भी आये वो अपना गला तुरंत तर कर ले, पूरी शंकरजी की बरात थी, बार बार सर उचककर बरात में सबका ध्यान भी रख रहे थे की पता नहीं कहा से भावना का कोई पुराना अपना दिल न दुखा ले, और बरात में बम और देशी कट्ट्टे ले के घुस जाए, बहुत ही घबरा भी रहे थे, छोटी छोटी बाते होने पर दमोह में गलियों में येही सब चलते है, पर उपरवाले की दया और, अनिल की खुशकिस्मती की उस दिन सब कुछ अच्छा हुआ, बड़ी धूम धाम से शादी हुई, दोनों ने खजुराहो में अपना हनीमून मनाया, अगले कुछ दिनों तक उनका जीवन सुखमय ही बीता, शायद भावना माँ बननेवाली थी और अनिल का भी ट्रान्सफर शहडोल हो गया, और भावना को लेकर वह शहडोल चला गया , तब से अब तक हमारा कोई संपर्क नहीं है,
उम्मीद है और शुभ कामना है की अनिल और भावना खुश होंगे,
ek din

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