मंगलवार, 28 सितंबर 2010

अधूरी दास्तान...


" तू चाँद था मेरी ज़मी का , तुझसे ही था जहां मेरा,
तुझसे ही थी खुशिया दिल की, तू ही था आसमा मेरा "
उसकी झंकार सी आवाज की खनक ... लगता है अभी अभी कानो में गूँज गई हो, यु की कही से कोई सदा आई हो जैसे....हवाओं में फैली खुशबू उसकी मौजूदगी का संदेह पैदा कर दिया करती है, कभी वो दिन थे की अल सुबह इंतज़ार होता था की कब उसे देख लू, और रात में तो ख्वाबो की कडिया न जाने कब से उसके अलावा और किसी के दीदार ही नहीं करा पाती थी। बस एक लम्हा सा था सतरंगा ... जब तक रहा बस होश न रहा । उसके सामने आते ही कमीनी एक ख़ामोशी सी फ़ैल जाती थी की जैसे सर्द बर्फ ने माहौल अपने आगोश में ले लिया हो, और बरसो से ज़मी हुई बर्फ के पिघलने की मै बस दुआ ही करता और ये मान बैठता की कमबख्त अब तो ये पल कभी न गुजरेगा, और बस कोई ..गिला न शिकवा...और न ही मुह से कोई बोल । दिल करता के अब बोलेगी तब, न वो कुछ कहती न दीवारे और न ही दरख़्त बोल पड़ते। और ऐसे ही ज़मी रही बर्फ सदियों तक !
वो सुनहरा वक़्त तो अब पारी - कथा सा हो चूका है । लेकिन अब भी रोम रोम में रोमांच और पागलपन भर देता है। मैंने उसे इक हवा सा पाया, जो मेरी जिंदगी में अपने आँचल में ताजगी भरी खुशबुए समेटे चली आयी...कुछ पल मुझे आगोश में भर ज़मी से ऊपर उड़ा ले गई, और मै अनमना सा ...ना समझा सा...उसके प्रभाव् में जैसे ख्वाबो की दुनिया में जा बसा था, लड़कपन की ये सुबह और शामे करवट बदलती ज़िन्दगी की निचे दबे रंगीन पन्नो से छूकर निकल गई है...
उसके कोमल हाथो को थामकर चले वो ज़िन्दगी के बेशकीमती पल, उसके पहलु में बैठकर बाते करना...साथ साथ खेले मासूम खेलो में उससे हार जाने के मौको की तलाश में रहना...वह भी मासूम सी मुस्कुराती हुई ...नज़रे झुकाकर बहुत कुछ कह जाने का वो कातिल अंदाज़ उसका , जैसे सब कुछ गजब था । मुझे नहीं याद की कभी कोई बात पर वो चाँद रूठ गया हो, नहीं कभी नहीं, तहजीब और हया के लिबास में लिपटी कोई कलि थी वो...तकदीर भी बहुत कम मौको में हमें मिला पाती थी। और जब मिलते तो लमहे तो बस लम्हों की तरह गुजर जाते और याद बरसो तक रह जाते।
किसी मंदिर में साथ कभी गए थे याद है...घंटियों की धुनों में मन उलझनों में बजता रहा...दिल ख़ुद से कह उठा था, भगवान् से...
" तुझसे कुछ और मांगने का अब हौसला नहीं होता मेरा....
जो मिला है उसी का रहेगा उम्र भर एहसान तेरा....."
उसकी हसरतो में ही मैंने अपने दिल की बाते कागज़ पर उतारनी शुरू कर दी थी...जो सिलसिला शुरू हुआ वो इस हद्द पर पहुंचा था की हम उम्र दोस्त तो पीछे ही पड़े रहते....और धीरे धीरे इसी सिलसिले ने अनजाने में मेरे लफ्जों को तराश दिया था । मुझे वो पल नहीं भूलता जब किसी ऐसी ही पुस्तक को उसने मुझसे पढ़ने मांग लिया था...और यु ही कह बैठा था की " कीमत लगेगी " इस पर रूठ बैठी मासूम पर किसी अपने ने ही जुल्म कर दिए थे..फिर भी शायद एक दो बार उसने पुस्तके पा ही ली थी। उसको हाले दिल ज़ाहिर कर ने के लिए कितनी कहानिया बना चूका था मै ...साथ में देखि हुई दो तीन फिल्मे तो उसने ही देखि थी , पुरे समय उसे ही देखता रहा था मै..दिल धड़कता रहा और मै धड़कनों को सुनता रहा।
" उस जूनून का मज़ा बेहिसाब है,जिसमे शोखियो का खुमार होता है
बस कुछ याद रहता नहीं सिर्फ नशा सा सवार होता है "
जैसे वो एक ख्वाब था जिसे उपरवाले ने करीने से सजाये हुए गुलदस्ते सा वहा रख दिया था। और फिर उस पर बुरी नज़र तो लगना लाज़मी था ही....नज़र भी ऐसी लगी की बरसो की पारिवारिक मिठास ज़हर की कडवाहट में बदल गई...और झुलस गया था मासूम सा मन....
लेकिन उसके जादू का असर ऐसा रहा है की बरसो पुरानी बाते पल भर पुराणी लगती है। दिल भी ऐसी गफलत पाले बैठा है के हवाए फिर से आयेंगी ...वही खुशबु लिए..... ।
बीते सालो में पास ही बहती इठलाती कन्हान की मस्तीभरी धाराओं ने कई मोड़ नए बना लिए है। कुछ जून दरख्तों ने ज़मी छोड़ दी है, और नए जवान हो गए कांटो भरे झुरमुट ने किनारों पे कब्ज़ा सा कर लिया है। इतने दिनों में सब कुछ बदला सा है...अब हवाए भी वो नहीं ..जिनसे खुश्बुओ का पता चलता... । इक समय अपनी मस्तियो और खुशियों से आबाद रहा वो चमन अपना ...एक शानदार टूटे हुए ख्वाब का अंजाम सा लग रहा है....अब अपनी गली से गुजरो तो दिखेगा की आशियाने भी ज़मींदोज़ हो गए दीखते है...बागीचे जो मशहूर थे अपनी बहारो के लिए...अब तो बर्बादी से पहचाने भी नहीं जाते...
अकेले कभी दिल सोचता है ....
"अपने आपको अब सारी उम्र की सजा दी है
ख़ुद अपने दामन में हमने आग लगा दी है'
अधूरी दास्तान दिलो में सुलग रही थी धीरे धीरे,
रुक रुक के शोलो को फिर से हवा दी है "


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